Monday, August 15, 2022
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City of Dreams 2 Review: राजनीति के घिनौनें चेहरे का खुलासा है ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स सीजन 2’

City of Dreams 2 Review: डिज़्नी हॉटस्टार ने पिछले कुछ समय में एक से बढ़ कर एक शोज/ वेब सीरीज दर्शकों के लिए प्रस्तुत की हैं। तो वहीँ दर्शकों को ये वेब सीरीज और शोज काफी पसंद भी आ रहें है। ये जरुरी नहीं है कि सरे शोज और वेब सीरीज दर्शकों को पसंद आए। ऐसी कई सीरीज है जिनकी स्टोरी दर्शकों को पसंद नहीं आती है। उनमे से एक है 2019 में नागेश कुकुनूर द्वारा निर्देशित वेब सीरीज ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ को वांछित सफलता नहीं मिली और एक ऐसे मोड़ पर कहानी आ कर रुकी थी कि दर्शक थोड़ा बोर हो गए थे। हाल ही में उसका सीजन 2 रिलीज किया गया है। इस से कहानी पूरी हुई है और अब पूरी सीरीज का मजा लिया जा सकता है। सिटी ऑफ ड्रीम्स सीजन 2 कई मायनों में खास है, जिसमें प्रिया बापट, अतुल कुलकर्णी, सचिन जैसे मंजे हुए कलाकारों को आपस में राजनीति करते हुए देखना एक अद्भुत अनुभव है। आपको मायानगरी के दोनों सीजन देखने चाहियें। कुल जमा 14 घंटों के करीब की बिंज वॉचिंग होगी। आप चाहें तो एक एक कर के सीजन भी देख सकते हैं लेकिन उसमें शायद उतना मज़ा न आये। नागेश कुकुनूर के निर्देशन में थ्रिलर हम पहली बार देख रहे रहे हैं और ये सीरीज देखने के बाद नागेश को भी शायद अब वेब सीरीज करने में ही मज़ा आएगा क्योंकि 2 घंटे की फिल्म से 7 घंटों का वेब सीरीज का सीजन, कहानियों को पूरी तरीके से दिखाने का मौका देता है। देख डालिये।

अतुल कुलकर्णी की प्रतिभा और अभिनय क्षमता को परिचय देने की आवश्यता नहीं है। अतुल की तुलना पानी से की जाना चाहिए। किरदार का रंग, रूप, आकार, प्रकार और विचार वो सब अपना लेते हैं। एक घायल नेता जिसकी बेटी अपने ही भाई को मरवा कर मुख्यमंत्री बन जाती है वो पितृसत्तात्मक विचारधारा वाला ये शख्स, अपनी बेटी को नीचा दिखाने के लिए और उसे हराने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। अतुल के किरदार का ग्राफ, कहानी की मांग के हिसाब से चढ़ता उतरता रहता है लेकिन व्हील चेयर पर पड़े हुए अतुल, तब भी अपने पैरों पर खड़े हुए सभी किरदारों पर भारी पड़ते हैं। प्रिया बापट, मराठी फिल्मों में सुपर सक्रिय हैं। इस वेब सीरीज में उन्होंने अभिनय का पूरा इंद्रधनुष बिखेर रखा है। एक घबराई हुई लड़की जो अपने भाई की गैरज़िम्मेदाराना और अहंकारी राजनीति से परेशां हो कर सारे सूत्र अपने हाथ में ले लेती है और अपने भाई की हत्या करवा कर अपने पिता के अहंकार के सामने खड़ी होती है, नए किस्म की राजनीति की शुरुआत करना चाहती है। प्रिया को हिंदी दर्शक नहीं जानते हैं।

सीरीज का टाइटल ट्रैक “ये है मायानगरी” पूरे सीरीज को परिभाषित कर सकता है। तापस रेलिया को इस काम के पूरी प्रशंसा मिलनी चाहिए। संग्रामी गिरी के ज़िम्मे इस बार सिनेमेटोग्राफी दी गयी थी और उन्होंने अच्छा काम किया है। क्लोज अप और मिड शॉट्स से सारा काम चल गया है क्योंकि इस बार अभिनय में चेहरे के भावों को प्रधानता दी गयी थी। एडिटर फारुख हुंडेकर हैं और इन्होने इस सीरीज की स्पीड और क्लिफहैंगर सिचुएशन को सही समय पर ला कर सीरीज को “बिंज वॉचिंग” के लिए उपयुक्त बना दिया। एक एपिसोड से दूसरे में आपको जाना ही पड़ता है। इस बार एक्शन थोड़ी अलग किस्म की थी इसलिए इस सीजन में जावेद करीम ने ये ज़िम्मेदारी निभाई है। क्लाइमेक्स का सीन उन्हीं के निर्देशन की वजह से प्रभावशाली बन पाया है। पहले सीजन में मोहम्मद अमीन खातिब ने एक्शन सीन्स डायरेक्ट किये थे और पहले सीजन में इतना एक्शन था भी नहीं।

सीरीज के रचयिता हैं नागेश कुकुनूर और उनके साथ उनके पुराने सहयोगी रोहित बनवालिकर जो कि सीरीज के लेखक हैं। मराठी अभिनेताओं को इस्तेमाल करने का सुझाव रोहित का ही था। कथानक में आवश्यक ट्विस्ट का समावेश करने से हर एपिसोड एक ऐसे मकाम पर ख़त्म होता है जो कि रोमांच बढ़ा देता है और इस सीरीज का क्लाइमेक्स इतना अप्रत्याशित है कि देखने वाले शॉक में चले जाते हैं। पुत्री राजनीति सीखती तो अपने पिता को देख कर है और क्या नहीं करना है इसकी जानकारी उसे अपने भाई को देख कर मिलती हैं। उसका अतीत किस तरह उसका दुश्मन बन कर सामने आता रहता है और जब उसे अपने पिता के विरोध की सभी हदों से पार जा कर लड़ना पड़ता है तो वो प्रयास करती है संस्कार और सच्चाई के बीच तालमेल बैठाने का। ये लेखन का कमाल है। इस सीरीज के हीरो नागेश या कलाकार अकेले नहीं हैं। रोहित का इस सीरीज की सफलता में उतना ही योगदान हैं।

सिटी ऑफ ड्रीम्स मुंबई और महाराष्ट्र की सत्ता की कहानी है। पहले सीजन में अमेय गायकवाड़ (अतुल कुलकर्णी) अपने मित्र जितेन पंड्या (उदय टिकेकर) और अपने खानसामे जगदीश गुरव (सचिन पिलगांवकर) के साथ मुंबई शहर और फिर प्रदेश की राजनीति में नाम कमाकर सत्ता पर काबिज़ हो जाता है। महत्वकांक्षी जगदीश भी उनके साथ तरक्की कर जाता है और एक समय आ कर अमेय गायकवाड़ पर गोलियां चलवा देता है और अमेय गंभीर रूप जख़्मी हो जाते हैं। प्रदेश की राजनीति में उथल पुथल न हो इसलिए अमेय गायकवाड़ का आवारा किस्म का नशेड़ी उत्तराधिकारी बेटा आशीष गायकवाड़ (सिद्धार्थ चांदेकर) पार्टी चलाने की कोशिश करता है। उसकी हरकतों की वजह से उसका विरोध होने लगता है, ऐसे में जगदीश अपनी चाल चलता है और अमेय गायकवाड़ की बेटी पूर्णिमा गायकवाड़ (प्रिया बापट) को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना देता है। भाई बहन के आपसी संघर्ष में पूर्णिमा अपने भाई की गैर जिम्मेदाराना हरकतों से तंग आ जाती है और एक पुलिसवाले वसीम खान (एजाज खान) की मदद से उसे नशे का इंजेक्शन दे कर मरवा देती है और खुद सत्ता संभल लेती है।

दूसरे सीजन की कहानी में जब अमेय गायकवाड़ को अपने बेटे की मौत और बेटी के मुख्यमंत्री होने की खबर मिलती है, वो समझ जाता है कि सारा खेल उसकी बेटी पूर्णिमा खेल रही है और जगदीश गुरव उसका सलाहकार बन बैठा है। व्हीलचेयर पर पड़ा अमेय गायकवाड़ अपनी बेटे की मौत से दुखी हो कर अपनी बेटी के खिलाफ जंग छेड़ देता है। इसके लिए वो कई चालें चलता है। बेटी के लेस्बियन होने की कहानी मीडिया में लाने की धमकी आ जाती है। बेटी के बॉयफ्रेंड से हुए पहले विवाह की बात मीडिया में आ जाती है। बेटी के बॉयफ्रेंड को बेटी के सामने विरोधी पार्टी का कैंडिडेट बना कर खड़ा कर देता है। पूर्णिमा अपने पिता की हर चाल का कभी अपने दिमाग से और कभी किस्मत से जवाब देती है। मुसलमानों से नफरत करने वाले अमेय गायकवाड़ अंतिम चाल के तौर पर मुसलमानों की बस्ती में दंगा करवाने की प्लानिंग करता है, तब वसीम खान उनके मंसूबों पर पानी फेर देता है। दंगा करने वालों में से एक, पूर्णिमा की विजय रैली में घुस कर बम विस्फोट करने में कामयाब हो जाता है। काफी लोगों की मौत हो जाती है, पूर्णिमा और वसीम जैसे तैसे बच जाते हैं लेकिन पूर्णिमा का बेटा इस विस्फोट में मारा जाता है।

सीजन 1 में कहानी में बहुत पेंच नहीं थे। सत्ता तक का रास्ते में अड़चनों की कहानी थी, लेकिन सीजन 2 कहीं बेहतर और कहीं ज़्यादा कसा हुआ है। दोनों सीजन में कई छोटे छोटे किरदार आते जाते रहते हैं लेकिन सीजन 2 के किरदारों का प्रभाव लम्बे समय तक रहता है। कई सब प्लॉट्स साथ चलते रहते हैं. पूर्णिमा के बॉयफ्रेंड के रूप में महेश अरावले (आदिनाथ कोठारे) की भूमिका बहुत कमाल लिखी गयी है। आदिनाथ, आने वाली फिल्म 83 (भारत की क्रिकेट विश्व कप जीतने की कहानी, निर्देशक कबीर खान) में दिलीप वेंगसरकर की भूमिका निभा रहे हैं और मराठी फिल्म जगत के जाने माने अभिनेता हैं। उनकी आदर्शवादिता, उनकी सच्चाई और उनका डूबा हुआ राजनीतिक करियर जब अपने फायदे के लिए अमेय उनका इस्तेमाल करते हैं और पूर्णिमा की बेवफाई से नाराज़ महेश, अपना इस्तेमाल होने देते हैं। एक हारे हुए खिलाडी को जीत का आखिरी मौका मिलने पर वो उसूलों से कितना समझौता कर सकता है, इसका सजीव चित्रण आदिनाथ के चेहरे पर देखा और पढ़ा जा सकता है।

सीजन 1 और 2 सिर्फ तीन किरदारों पर चलते हैं। अतुल कुलकर्णी, प्रिया बापट और सचिन पिलगांवकर। अभिनय के अनुभव की सचिन की अपनी एक लम्बी पारी है। न सिर्फ वो बड़े बड़े निर्देशकों के चहीते रहे हैं बल्कि इस रोल के लिए नागेश कुकुनूर को उन्हें कुछ भी समझाना पड़ा होगा ऐसा लगता ही नहीं है। खानसामे से लेकर नेता और फिर प्रदेश की राजनीति में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष तक का सफर, एक काइयाँ आदमी के किरदार की यात्रा थी। एक पुराने पुलिस केस को निकाल कर जब अमेय गायकवाड़, उनसे अपने साथ किये गए विश्वासघात का बदला लेने पर आते हैं तो डरे हुए सचिन, तुरंत अमेय गायकवाड़ का फेवरेट चिकन बना कर ले जाते हैं और उनसे माफ़ी मांग कर अपने आप को सुरक्षित कर लेते हैं। उस वक़्त सचिन ये भूल जाते हैं कि वो पूर्णिमा गायकवाड़ के राजनीतिक गुरु हैं। मौका परस्त लोग शक्ल से मौका परस्त नहीं होते मगर राजनीति में अपने आप को बचाने के लिए हँसते मुस्कुराते हुए कैसे थूका हुआ चाटा जाता है, ये बात सचिन के इस किरदार से सीखनी चाहिए।

 

 

 

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